सह अन्याय चुपचाप नहीं बैठेंगे हम ,
कलम से ही सही , पर वार तो करेंगे हम .
जब छा जाएगी चहु दिशा में घनी काली अँधियारी,
और मदद को चिल्लाएगी भीड़ से घिरी एक अबला नारी ,
तब सोए हुए वीरों को जगाने के लिए गीत नए गढ़ेंगे हम ,
कलम से ही सही , पर वार तो करेंगे हम.
जब पापीयों के पाप से होगी ये धरा नम,
और मनुज के होगा समक्ष उसके अस्तित्व का ही प्रश्न,
तब मशाल आशा का लिए दिशा नयी दिखलायेंगे हम ,
कलम से ही सही पर वiर तो करेंगे हम .
लहू बहाए बिन मिलता नहीं है न्याय गर ,
भय हमें नहीं यदि कट जाये भी ये सर ,
रक्त की नदिया बहाने के लिए तलवार भी धरेंगे हम ,
कलम से ही नहीं असल का वार भी करेंगे हम .
आखिरी लाइन ज़ोरदार है
ReplyDeletewth no ideas of supporting any violent ' वार '